'ईरान को धमकाना बंद करो'! पेज़ेशकियान का अमेरिका और खाड़ी देशों को करारा जवाब

ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियान ने अमेरिका और खाड़ी देशों पर निशाना साधते हुए कहा कि ईरान किसी दबाव के आगे नहीं झुकेगा। उन्होंने अमेरिकी सैन्य ठिकानों और क्षेत्रीय हस्तक्षेप पर सवाल उठाए।

Aug 8, 2026 - 12:20
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'ईरान को धमकाना बंद करो'! पेज़ेशकियान का अमेरिका और खाड़ी देशों को करारा जवाब

खाड़ी देशों में विदेशी सैन्य ठिकानों पर भड़के ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियान

ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियान ने हाल ही में क्षेत्रीय देशों और अमेरिका की नीतियों पर कड़ा रुख अपनाते हुए तीखे सवाल उठाए हैं। उन्होंने खाड़ी देशों के उन हुक्मरानों को आड़े हाथों लिया जो अपने यहां विदेशी सेनाओं को ठिकाने मुहैया कराते हैं। पेज़ेशकियान ने दो टूक पूछा कि आखिर ये देश अपनी ही ज़मीन पर मौजूद अमेरिकी सैन्य अड्डों का इस्तेमाल ईरान के खिलाफ हमलों के लिए क्यों होने दे रहे हैं।

उन्होंने मिनाब स्कूल पर हुए दर्दनाक हमले का खास तौर पर हवाला दिया और कहा कि इस तरह के घातक हवाई हमले उन्हीं पड़ोसी और मित्र देशों के आसमान व ठिकानों से अंजाम दिए गए। तेहरान का मानना है कि स्थानीय सरकारों द्वारा विदेशी ताकतों को अपने घर में पैर पसारने की छूट देना पूरे इलाके की शांति और सुरक्षा के लिए एक बड़ा खतरा बनता जा रहा है।

विदेशी दबाव के आगे न झुकने की दो टूक चेतावनी

इस गर्मागरम माहौल के बीच, ईरानी नेतृत्व ने यह साफ कर दिया है कि उनका देश किसी भी पड़ोसी मुल्क पर हमला करने का कोई इरादा नहीं रखता है। पेज़ेशकियान ने जोर देकर कहा कि ईरान न तो किसी को बेवजह धमकाना चाहता है और न ही किसी बाहरी ताकत या धौंस के आगे सिर झुकाने को तैयार है।

उन्होंने वाशिंगटन पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि पश्चिमी देशa लगातार क्षेत्रीय मामलों में दखलअंदाजी कर रहे हैं और ईरान के प्राकृतिक संसाधनों पर अपना नियंत्रण जमाने की फिराक में हैं। इसी वजह से तेहरान अपनी संप्रभुता से समझौता करने के बजाय हर हाल में खुद को बचाने के लिए पूरी तरह मुस्तैद बैठा है, और किसी भी प्रकार के बाहरी अल्टीमेटम का कड़ा जवाब देने के लिए तैयार है।

मध्य पूर्व में गहराते भू-राजनीतिक तनाव और कूटनीतिक उलझन

पेज़ेशकियान के इन बयानों से साफ जाहिर होता है कि मध्य पूर्व की सियासत में तनाव किस हद तक बढ़ चुका है। एक तरफ जहां ईरान अपने पड़ोसियों के साथ दोस्ताना रिश्ते और क्षेत्रीय सहयोग की वकालत कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ विदेशी सेनाओं की मौजूदगी इस पूरे समीकरण को बेहद उलझा हुआ बना रही है।

अब स्थानीय हुक्मरानों के सामने एक बहुत बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है कि वे अपनी सुरक्षा नीतियों को कैसे संभालें ताकि वे महाशक्तियों की खींचतान का शिकार न बनें। जैसे-जैसे कूटनीतिक रास्ते संकरे हो रहे हैं, इस इलाके का भविष्य इस बात पर टिका है कि देश आपसी तालमेल बिठा पाते हैं या फिर बढ़ते टकराव की आग में और ज्यादा झुलसते हैं।

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