स्कूल जाने के लिए रेलवे ट्रैक पार करते हैं बच्चे, पालघर के वाढीव गांव में सड़क का इंतजार

 महाराष्ट्र के पालघर जिले के वाढीव गांव से एक वीडियो सामने आया है, जो विकास के बड़े-बड़े दावों की पोल खोल रहा है। यहां के स्कूली बच्चों को स्कूल जाने के लिए सड़क नहीं, बल्कि रेलवे ट्रैक और रेलवे पुल पार करना पड़ता है। हर दिन ये बच्चे अपनी जान जोखिम में डालकर पढ़ने जाते हैं।

Aug 24, 2026 - 23:21
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स्कूल जाने के लिए रेलवे ट्रैक पार करते हैं बच्चे, पालघर के वाढीव गांव में सड़क का इंतजार

4000 लोगों का गांव, एक भी पक्की सड़क नहीं
वाढीव गांव में 4 हजार से ज्यादा लोग रहते हैं, लेकिन गांव को मुख्य सड़क से जोड़ने वाला कोई सुरक्षित रास्ता ही नहीं है। गांव से बाहर निकलने का एक ही रास्ता है - वैतरणा खाड़ी के ऊपर बना रेलवे पुल और रेलवे ट्रैक।

बड़े तो जैसे-तैसे निकल भी जाते हैं, लेकिन सबसे ज्यादा खतरा बच्चों के लिए है। 8वीं के बाद आगे की पढ़ाई के लिए बच्चों को गांव से बाहर जाना पड़ता है और रोज इसी खतरनाक ट्रैक से गुजरना पड़ता है।

बच्चे बोले - हर दिन ट्रेन का डर लगा रहता है
गांव के एक छात्र सोहिल चौधरी ने इस पूरी समस्या का वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर डाला, जिसके बाद यह मामला वायरल हो गया। वीडियो में साफ दिख रहा है कि कैसे स्कूली बैग टांगे बच्चे रेल की पटरियों के बीच से गुजर रहे हैं।

सोहिल ने वीडियो में सवाल उठाया है कि जब देश में बुलेट ट्रेन और एक्सप्रेसवे बन रहे हैं, तो हमारे गांव के बच्चों के लिए स्कूल जाने लायक एक छोटी सी सड़क क्यों नहीं बन सकती? बच्चों का कहना है कि ट्रैक पर चलते वक्त हमेशा सामने से ट्रेन आने का डर बना रहता है।

मरीजों को कंधे पर उठाकर ले जाना पड़ता है
परेशानी सिर्फ स्कूल जाने तक नहीं है। अगर गांव में कोई बीमार पड़ जाए तो एम्बुलेंस गांव तक पहुंच ही नहीं सकती। परिवार वालों को मरीज को कंधे पर उठाकर, खाड़ी और रेलवे ट्रैक पार करके बाहर ले जाना पड़ता है। कई बार समय पर अस्पताल न पहुंचने से हालत और बिगड़ जाती है।

बुलेट ट्रेन बन रही है, पर गांव की सड़क नहीं
सबसे बड़ा सवाल यही है कि पालघर में ही मुंबई-वडोदरा एक्सप्रेसवे और मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन जैसे हजारों करोड़ के प्रोजेक्ट बन रहे हैं, लेकिन वाढीव गांव आज भी एक अदद सड़क के लिए तरस रहा है।

ग्रामीणों की अब सिर्फ एक ही मांग है - उन्हें आश्वासन नहीं, एक पक्की सड़क चाहिए। वैतरणा खाड़ी पर एक छोटा पुल या कोई वैकल्पिक रास्ता बन जाए तो बच्चों की जान का खतरा खत्म होगा और मरीजों को समय पर इलाज मिल सकेगा।

यह तस्वीर एक बड़ा सवाल खड़ा करती है कि अगर बच्चों को शिक्षा के लिए ही जान दांव पर लगानी पड़े, तो आखिर विकास किसके लिए है?

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