लैब में तैयार हो रहे हैं इंसानी दिमाग के ‘मिनी मॉडल’, वैज्ञानिकों की रिसर्च से बढ़ी उम्मीदें
वैज्ञानिक स्टेम सेल से लैब में ब्रेन ऑर्गेनॉइड्स यानी मानव मस्तिष्क के छोटे 3D मॉडल विकसित कर रहे हैं। इनका इस्तेमाल मस्तिष्क के विकास, न्यूरोलॉजिकल बीमारियों और संभावित उपचारों पर रिसर्च के लिए किया जा रहा है।
नई दिल्ली: वैज्ञानिक अब प्रयोगशालाओं में इंसानी दिमाग के बेहद छोटे और सरल मॉडल तैयार कर रहे हैं। इन्हें आमतौर पर ब्रेन ऑर्गेनॉइड्स (Brain Organoids) कहा जाता है। ये पूरी तरह विकसित मानव मस्तिष्क नहीं हैं, बल्कि मानव कोशिकाओं से तैयार किए गए छोटे 3D मॉडल हैं, जिनमें दिमाग की कुछ संरचनाओं और कोशिकीय गतिविधियों जैसी विशेषताएं देखी जा सकती हैं।
स्टेम सेल से तैयार किए जाते हैं मॉडल
वैज्ञानिक आमतौर पर स्टेम सेल का इस्तेमाल करके इन ब्रेन ऑर्गेनॉइड्स को विकसित करते हैं। नियंत्रित प्रयोगशाला परिस्थितियों में कोशिकाओं को ऐसे संकेत दिए जाते हैं, जिससे वे तंत्रिका कोशिकाओं और दिमाग से जुड़ी कुछ अन्य कोशिकाओं जैसी संरचनाएं बनाने लगती हैं।
इन मॉडलों का आकार वास्तविक मानव मस्तिष्क की तुलना में बेहद छोटा होता है। इनमें मानव मस्तिष्क की पूरी जटिलता या सभी क्षमताएं मौजूद नहीं होतीं। इसलिए इन्हें ‘मिनी ब्रेन’ कहना सुविधाजनक है, लेकिन वैज्ञानिक इन्हें अधिक सटीक रूप से मस्तिष्क के प्रयोगशाला मॉडल मानते हैं।
बीमारियों को समझने में मिल सकती है मदद
ब्रेन ऑर्गेनॉइड्स का सबसे महत्वपूर्ण इस्तेमाल वैज्ञानिक अनुसंधान में हो रहा है। इनके जरिए शोधकर्ता यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि मस्तिष्क का विकास कैसे होता है और कुछ न्यूरोलॉजिकल बीमारियों में कोशिकाओं के स्तर पर क्या बदलाव आते हैं।
वैज्ञानिक ऑटिज्म, मिर्गी, अल्जाइमर और अन्य न्यूरोलॉजिकल स्थितियों से जुड़े जैविक तंत्रों का अध्ययन करने के लिए भी ऐसे मॉडल का इस्तेमाल कर रहे हैं। इससे भविष्य में संभावित उपचारों और दवाओं की शुरुआती जांच में मदद मिल सकती है।
रिसर्च के साथ नैतिक सवाल भी
इस तकनीक के विकास के साथ कई वैज्ञानिक और नैतिक सवाल भी सामने आए हैं। विशेषज्ञों के बीच यह चर्चा जारी है कि भविष्य में अगर ऐसे मॉडल अधिक जटिल होते हैं, तो उनके इस्तेमाल और शोध के लिए किस तरह के नैतिक नियम होने चाहिए।
फिलहाल ब्रेन ऑर्गेनॉइड्स को पूर्ण मानव मस्तिष्क नहीं माना जाता। इनमें सोचने, बोलने या इंसान की तरह चेतना रखने की क्षमता नहीं होती। फिर भी, इनका विकास न्यूरोसाइंस के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण शोध उपकरण बनता जा रहा है।
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